हिमाचल प्रदेश की बेताल गुफा बताये

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बेताल गुफा मंडी जिले की सुंदरनगर तहसील ऐसी ही एक रोमांच से भरी गुफा है | यहां भौणबाड़ी की माता शीतला की पहाड़ी तलहटी में उत्तर दिशा में हमें बेताल गुफा के दर्शन होते हैं, जहां किसी समय शुद्ध देसी घी और बर्तन मिलते थे।

स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि गुफा से प्राचीन काल के बर्तन मिलते थे, जो ब्याह-शादी या अन्य कार्यक्रमों में इस्तेमाल में लाए जाते थे। इसके लिए घर का मुखिया पूजा की थाली सजाकर गुफा के द्वार पर सिंदूर से ‘न्यूंदरा’ (निमंत्रण) लगाता था और धूप-दीप जलाकर सच्चे मन से अमुक दिन के लिए जो भी बर्तन चाहिए होते थे, उनके बारे में गुफा के मुख्यद्वारा पर बोलता। बाद में घर के मुखिया द्वारा मांगे गए बर्तन उसी दिन गुफा से प्राप्त हो जाते थे। कार्यक्रम की समाप्ति पर मुखिया द्वारा इन बर्तनों गुफा में छोड़ दिया जाता था। लोगों के जाते ही फिर से ये बर्तन चमत्कारिक रूप से गायब हो जाते थे।

इसलिए मिलना बंद हुए बर्तन
बुजुर्गों का कहना है कि एक बार गांव का ही कोई व्यक्ति गुफा में निमंत्रण देने के बाद कुछ बर्तन ले गया। बाद में उसके मन में लालच आ गया और उसने गुफा को ये बर्तन नहीं लौटाए। उसके बाद से गुफा से बर्तन मिलने का सिलसिला बंद हो गया।

आज भी कायम है देसी घी रिसने के निशान
बेताल गुफा में देसी घी मिलने के निशान आज भी देख सकते हैं। ऐसी किन्वंदति है कि गुफा से शुद्ध देसी घी टपकता था, जिसका इस्तेमाल लोग शादी-ब्याह और दूसरे कार्यक्रमों के लिए करते थे। यह भी किसी रहस्य से कम नहीं था कि आखिर यह देसी घी आता कहां से था। यदि आप अंदर से गुफा की बनावट पर नजर दौड़ाएं तो आप घी वाली बात को यहां सच होता पाएंगे।

इसलिए बंद हुआ गुफा से देसी घी मिलना
स्थानीय लोगों का कहना है कि एक बार किसी ग्वाले ने अपनी भेड़-बकरियों के साथ एक रात यहां शरण ली और उसी दिन के बाद से यहां से देसी घी मिलना भी बंद हो गया। इसके पीछे जो कारण बताया जाता है, वह भी काफी रोचक है।

लोगों का कहना है कि गुफा में रात को शरण लेने वाले ग्वाले ने पत्थरों से रिस रहे देसी घी को जूठा कर दिया था। वह अपनी जूठी रोटी को बार-बार घी में मलता और फिर उसे खा जाता था, जिससे यह घी दूषित हो गया और उसके बाद गुफा से घी रिसने का यह क्रम भी बंद हो गया।

सुरम्य दृश्यों को देख हो जाएंगे मंत्र-मुग्ध


चारों ओर से हरियाली से आच्छादित बेताल गुफा के बीच से छोटा जैसा नाला बहता है, जिसमें बहने वाले पानी की कल-कल की ध्वनि खुशनुमा संगीत से महौल को खुशनुमा बना देती है। इस गुफा की लंबाई लगभग 35-40 मीटर है तथा यह दोनों तरफ से खुली है। एक तरफ से इसके मुख का व्यास कम है तथा दूसरी तरफ ज्यादा। गुफा की ऊंचाई लगभग 15 फीट है। इसके भीतर लगभग देवी-देवताओं की 45-50 छोटी-बड़ी के मूर्तियां भी हैं।

माता शीतला के गण हैं बेताल
बेताल गुफा के संदर्भ में ऐसी मान्यता है कि गुफा के प्रधान बेताल, माता शीतला के गण हैं, जिसके चलते यह लोगों की आस्था का स्थल है। यह गुफा लोगों की मनौतियां पूरी करती है, जब किसी का पशु बीमार हो जाता है या दूधारु पशु दूध देना बंद कर दे या फिर किसी पशु में बांझपन की समस्या हो तो बेताल गुफा में पूजा-पाठ करने से पशु स्वस्थ, दुधारु और प्रजनन योग्य हो जाता है।

सावन के पहले दिन होती है विशेष पूजा-अर्चना
बेताल गुफा में ‘चडन्याला’ (सावन महीने के पहले पखवाड़े में पड़ने वाला दिन) के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। स्थानीय प्रशासन की ओर से गुफा में रोशनी का प्रबंध किया जाता है। गुफा के बड़े मुख की ओर से गुफा के अंदर नाले के एक ओर से मुख्य पूजा के स्थान तक एक छोटा रास्ता जाता है। छोटे मुख से जाने में थोड़ी कठिनाई हो सकती है, लेकिन श्रद्धा की शक्ति के सामने यह कठिनाई काफी पीछे रह जाती है।

बाहरी दुनिया के लोग आज भी अंजान है बेताल गुफा से
अपने आप में कई रहस्यों और रोमांच को समेटे इस गुफा से आज भी बाहरी लोग अनजान हैं, लेकिन दुनिया को इसके महत्व का पता होना चाहिए। इसीलिए हमने आज के कॉलम में बेताल गुफा के कुछ रहस्यों से पर्दा उठाने का प्रयास किया है।

ऐसे पहुंचा जा सकता है बेताल गुफा तक
हिमाचल के सुंदरनगर से लगभग तीन किलोमीटर दूर मैरामसीत सड़क से करीब 50 फुट की दूरी पर बेताल गुफा स्थित है। यहां पर किसी भी वाहन के जरिये आसानी से पहुंचा जा सकता है।

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